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"मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी बच्चों को मैथ्स पढ़ाया। एक-एक पैसा जोड़ना सिखाया। पर उस दिन... उस एक मिनट में, मेरा सारा हिसाब गलत हो गया। उन्होंने मेरा कंप्यूटर हैक नहीं किया था। उन्होंने मेरा दिमाग हैक कर लिया था।" यह कहानी किसी हाई-टेक हैकर की नहीं है जो रात के अंधेरे में डार्क वेब पर बैठा हो। यह कहानी एक आम दिन, एक आम घर और एक आम फोन कॉल की है। एक ऐसी कहानी जो आपके पिता, आपकी मां, या शायद कल आपके साथ भी हो सकती है।
"उसने सिर्फ एक सिम (SIM) ली थी... लेकिन उसकी पहचान किसी और के हाथ में चली गई।" क्या होगा अगर एक आम दिन, आपके फोन पर किसी साइबर पुलिस ऑफिसर की कॉल आए और वो आपसे पूछे: "क्या ये मोबाइल नंबर आपका है?" आप घबराकर इनकार करें, पर पुलिस का जवाब आपके पैरों तले ज़मीन खिसका दे कि—ये नंबर आपके पैन (PAN) और आधार कार्ड पर रजिस्टर्ड है और इससे करोड़ों का साइबर फ्रॉड हो चुका है।
"रमेश ने सिर्फ एक सिम कार्ड के लिए अपने आधार की फोटोकॉपी दी थी। बिना साइन, बिना तारीख के। उसे लगा काम खत्म हो गया... लेकिन उसी पल, किसी अनजान शहर के एक अंधेरे कमरे में उसकी 'पहचान' नीलाम हो चुकी थी। जब छह महीने की खामोशी के बाद अचानक पुलिस का फोन और 5 लाख के लोन का रिकवरी नोटिस उसके दरवाजे पर पहुंचा, तब उसे अहसास हुआ कि उसने अपनी जेब नहीं, अपनी पूरी जिंदगी किसी क्रिमिनल के हाथ में रख दी थी। यह कहानी है एक आम आदमी की सबसे खौफनाक लड़ाई की—अपनी ही पहचान वापस पाने की।"