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"पापा के जाने के बाद एक अनजान लिफाफा घर आया, जिसमें 4 लाख का कर्ज़ लिखा था। माँ हैरान थीं, पापा ने तो कभी उधार नहीं लिया था। क्या ये सच था या कोई धोखा? एक मध्यमवर्गीय परिवार की भावुक कहानी और कानूनी सच्चाई।"
"मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी बच्चों को मैथ्स पढ़ाया। एक-एक पैसा जोड़ना सिखाया। पर उस दिन... उस एक मिनट में, मेरा सारा हिसाब गलत हो गया। उन्होंने मेरा कंप्यूटर हैक नहीं किया था। उन्होंने मेरा दिमाग हैक कर लिया था।" यह कहानी किसी हाई-टेक हैकर की नहीं है जो रात के अंधेरे में डार्क वेब पर बैठा हो। यह कहानी एक आम दिन, एक आम घर और एक आम फोन कॉल की है। एक ऐसी कहानी जो आपके पिता, आपकी मां, या शायद कल आपके साथ भी हो सकती है।
यह कोई डरावनी कहानी नहीं, बल्कि मानव मनोविज्ञान (Human Psychology) और दबे हुए अपराध-बोध (Guilt) का एक गहरा आईना है। क्या दुनिया की नज़रों में 'बेक़सूर' इंसान, अपनी ही अंतरात्मा की अदालत से बरी हो पाएगा? पढ़िए एक ऐसा साइकोलॉजिकल थ्रिलर, जो अंत में आपको भी यह सोचने पर मजबूर कर देगा कि— "क्या मैं भी कभी किसी के साथ अन्याय कर चुका हूँ?"