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Jhooth Ka Kafan
Criminal Law
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Jhooth Ka Kafan

यहाँ "झूठ का कफन" कहानी का एक बेहद भावुक और रोंगटे खड़े कर देने वाला छोटा अंश (Excerpt) है। इसे पढ़ते हुए आपको एक खामोश कोर्टरूम का सन्नाटा और एक इंसान का दर्द महसूस होगा: "अदालत खाली हो चुकी थी। जज साहब के आखिरी शब्द— 'बा-इज़्ज़त बरी'— अभी भी उन सूनसान दीवारों से टकरा रहे थे। रवि ने कांपते हाथों से कटघरे की उस खुरदरी लकड़ी को छुआ, जहाँ खड़े होकर उसने अपनी ज़िंदगी के पांच साल एक मुज़रिम की तरह गुज़ारे थे। आज वो जीत गया था। कानून की नज़रों में वो बेदाग़ था। लेकिन... जब उसने पीछे मुड़कर दर्शक दीर्घा की खाली कुर्सियों की तरफ देखा, तो वहां कोई तालियां बजाने वाला नहीं था। वहां ना उसकी बूढ़ी माँ थी, ना उसकी पत्नी की सुकून भरी मुस्कान, और ना ही उसके बच्चों का वो मासूम बचपन जो इन केस की फाइलों में कहीं दब कर घुट गया था। न्याय ने उसके हाथों से हथकड़ी तो खोल दी थी... लेकिन एक झूठे इंसान के फरेब ने उसकी रूह को हमेशा के लिए उसी कटघरे में कैद कर दिया था।"

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