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हर त्योहार, हर खुशी में एक जगह खाली रही। तीन दशकों तक आम के पेड़ के नीचे रखी एक पुरानी, घिसी-पिटी लकड़ी की कुर्सी। यह सिर्फ फर्नीचर नहीं थी, यह एक याद थी, एक अनसुलझा सवाल। "एक कुर्सी... जो 30 साल तक खाली रही" एक लापता बुजुर्ग और एक परिवार के खामोश इंतज़ार की कहानी है, जब तक कि एक पुराना खत घावों को कुरेदकर और इतिहास को फिर से नहीं लिख देता।
आँखें हमेशा पूरा सच नहीं दिखातीं... एक साइलेंट कैमरा भी धोखा दे सकता है।" एक रिटायर्ड टीचर के CCTV ने 'शांति विहार' कॉलोनी में एक क्राइम रिकॉर्ड किया, और पूरी कॉलोनी ने तुरंत एक आदमी को मुजरिम मान लिया। लेकिन जब हर चैप्टर नए फ्रेम और ब्लाइंड स्पॉट्स खोलता है, तो पता चलता है कि कैमरे ने झूठ नहीं बोला था... बल्कि लोगों ने उसकी अधूरी कहानी को ही पूरा सच मान लिया था। पढ़िए यह सस्पेंस से भरा साइकोलॉजिकल थ्रिलर, जो आपको अपने आस-पास की सच्चाई पर सोचने पर मजबूर कर देगा।