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"सच बोलना आसान था... सच साबित करना मुश्किल।" एक ईमानदार स्कूल टीचर की आम ज़िंदगी तब रातों-रात पलट जाती है, जब एक पुराने केस के सिलसिले में उसे पुलिस का फोन आता है। उसका पहला सवाल होता है— "अगर मैं बेकसूर हूँ, तो मुझे डर किस बात का?" लेकिन उसे जल्द ही यह खौफनाक सच्चाई समझ आ जाती है कि पुलिस स्टेशन की डायरी और कोर्टरूम की खामोशी में इंसान का सच नहीं, बल्कि उसके कागज़ और सबूत बोलते हैं। पढ़िए एक ऐसा साइकोलॉजिकल लीगल थ्रिलर, जो आपको यह सोचने पर मजबूर कर देगा कि क्या कानून की नज़र में सिर्फ 'बेकसूर होना' काफी है, या 'बेकसूर साबित होना' ही जीवन की सबसे बड़ी जंग है?
"थाने चलिए... कुछ सवाल पूछने हैं।" सिर्फ इन चार शब्दों ने एक सीधे-साधे इंसान की पूरी दुनिया हिला दी। पत्नी सहम गई, बच्चे घबरा गए और पड़ोसी उसे किसी मुजरिम की तरह घूरने लगे। रमेश को लगा कि उसकी ज़िंदगी खत्म हो गई... लेकिन थाने पहुँचकर जो सच सामने आया, उसने सब कुछ पलट दिया। वह कोई अपराधी नहीं, बल्कि एक अहम गवाह था! क्या पुलिस के घर आने का मतलब हमेशा गिरफ्तारी होता है? एक आम आदमी की इस थ्रिलर कहानी के ज़रिए समझिए अपने कानूनी अधिकार और जानिए 'पुलिस पूछताछ' और 'गिरफ्तारी' के बीच का असली फर्क। "सबसे बड़ा डर अक्सर सच से नहीं... सच को ना जानने से होता है।"