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Patna High Court ने अपने फैसले (Cr. Misc. No. 18394 of 2019) में यह स्पष्ट किया है कि डॉक्टर द्वारा इलाज में की गई हर गलती या 'Error of Judgment' आपराधिक लापरवाही (Criminal Negligence) नहीं होती। धारा 304-A IPC के तहत आपराधिक दायित्व तय करने के लिए लापरवाही का स्तर 'घोर' (Gross Negligence) होना चाहिए। इस ब्लॉग में हमने Supreme Court के Jacob Mathew फैसले, Bolam Test और Civil बनाम Criminal Liability के अंतर को सरल हिन्दी में समझाया है। मरीजों, डॉक्टरों और कानून के छात्रों के लिए यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण विश्लेषण है।
क्या आप जानते हैं कि एक अनरजिस्टर्ड वसीयत (Unregistered Will) भी पूरी तरह मान्य हो सकती है? पटना हाईकोर्ट ने First Appeal No. 531 of 1981 में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाकर स्पष्ट किया है कि केवल पंजीकरण न होने के आधार पर प्रोबेट केस को खारिज नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट के नवीनतम दृष्टांतों के प्रकाश में इस ब्लॉग में जानें कि रायती/कृषि भूमि के मामले में वसीयत की सत्यता कैसे जांची जाती है और प्रोबेट की क्या अहमियत है।
क्या कोई पत्नी केवल इस आधार पर अपना 498A या दहेज उत्पीड़न का आपराधिक मुकदमा दूसरे जिले में ट्रांसफर करा सकती है क्योंकि उसने अपना शहर बदल लिया है? 03 नवम्बर 2023 को Patna High Court ने (Criminal Miscellaneous No. 6335 of 2023) मामले में फैसला सुनाते हुए इसका उत्तर 'नहीं' में दिया है। माननीय न्यायालय ने स्पष्ट किया कि Section 407 CrPC के तहत केस का ट्रांसफर न्याय और गवाहों की सुविधा के आधार पर होता है, न कि किसी एक पक्ष की व्यक्तिगत सुविधा के लिए। 498A मामलों में केस ट्रांसफर के नियम समझने के लिए पढ़ें यह पूरी कानूनी व्याख्या।
क्या केवल मौखिक मृत्युपूर्व घोषणा (Oral Dying Declaration) के आधार पर किसी को हत्या का दोषी ठहराया जा सकता है? 09 अक्टूबर 2023 को Patna High Court की Division Bench ने Criminal Appeal Nos. 325, 456 & 481 of 2017 में एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए स्पष्ट किया कि कमजोर साक्ष्य, संदिग्ध गवाही और पुलिस की लचर जांच के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती। इस लेख में जानें कि कैसे 800 गज दूर से आवाज सुनने के दावे और कपड़ों पर कट के निशान न होने के कारण कोर्ट ने अभियुक्तों को Benefit of Doubt देते हुए बरी कर दिया। यह क्रिमिनल लॉ और एविडेंस एक्ट को समझने के लिए एक मास्टरक्लास है।
03 जनवरी 2024 को पटना हाई कोर्ट की खंडपीठ ने LPA No. 907/2023 में एक ऐतिहासिक निर्णय दिया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि Senior Citizen Act, 2007 के तहत गठित Tribunal के पास बेटे या बहू को संपत्ति से बेदखल (Evict) करने का कोई सीधा अधिकार नहीं है, जब तक कि मामला अधिनियम की धारा 23(1) की शर्तों को पूरा न करता हो। ट्रिब्यूनल केवल भरण-पोषण दिला सकता है, लेकिन बेदखली के लिए सिविल कोर्ट जाना होगा। इस लेख में जानें इस कानूनी सिद्धांत की पूरी व्याख्या, सुप्रीम कोर्ट के फैसले और आपके कानूनी अधिकार।